क्या शिक्षा की बलि देकर लोकतंत्र मजबूत होगा?

 क्या शिक्षा की बलि देकर लोकतंत्र मजबूत होगा? — एक BLO शिक्षक की व्यथा

​आज का दौर डिजिटल इंडिया और दक्षता (Efficiency) का है, लेकिन हमारे जमीनी प्रशासनिक कार्यों में आज भी वही दशकों पुरानी परिपाटी चल रही है। विशेषकर शिक्षा विभाग के कंधों पर जब 'बीएलओ' (Booth Level Officer) का भारी-भरकम झोला टांग दिया जाता है, तो नुकसान सिर्फ शिक्षक का नहीं, बल्कि उन मासूम बच्चों का होता है जो कक्षा में अपने गुरुजी की राह तकते रह जाते हैं।

​1. दो नावों की सवारी: विभाग बनाम ड्यूटी

​एक शिक्षक की मूल नियुक्ति शिक्षा दान के लिए हुई है। लेकिन वर्तमान में, शिक्षक स्कूल जाने के बजाय गांव-गांव की गलियों में नोटिस बांटने, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने के लिए मजबूर है। जब एक बीएलओ शिक्षक स्कूल पहुँचता भी है, तो उसका मन रजिस्टर के आंकड़ों और फील्ड की 'डिटेल्स' में उलझा रहता है। क्या ऐसी मानसिक स्थिति में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण संभव है?

​2. स्कूलों का गिरता शैक्षिक स्तर और सुरक्षा

​जैसा कि देखने में आया है कई जगह— 200 से 250 बच्चों पर मात्र 3 या चार स्टाफ, और उनमें से भी एक बीएलओ ड्यूटी पर! ऐसी स्थिति में:

​कक्षाएं भगवान भरोसे हैं।

​विद्यालय का अनुशासन और माहौल बिगड़ रहा है।

​शिक्षकों की कमी से बच्चों का 'लर्निंग लॉस' हो रहा है जिसकी भरपाई कोई चुनाव आयोग नहीं कर सकता।

​3. 'फुल टाइम' कार्य के लिए 'पार्ट टाइम' व्यवस्था क्यों?

​बीएलओ का कार्य अब केवल चुनाव के दिनों तक सीमित नहीं रह गया है। यह साल भर चलने वाली प्रक्रिया बन चुकी है (निरंतर अद्यतन, आधार लिंकिंग, मतदाता पहचान पत्र सुधार आदि)। जब कार्य 'फुल टाइम' है, तो इसके लिए दूसरे विभागों से 'उधार' के कर्मचारी लेकर उनके मूल कार्य को बाधित करना कहाँ तक तर्कसंगत है?

​तार्किक समाधान: स्वतंत्र नियुक्तियों की आवश्यकता

​समय आ गया है कि सरकार इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करे। हमारे सुझाव निम्नलिखित हैं:

​स्वतंत्र बीएलओ कैडर: सरकार को पंचायत स्तर और विधानसभा स्तर पर स्थायी बीएलओ की नियुक्ति करनी चाहिए। इससे रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

​शिक्षण कार्य को 'नो-गो ज़ोन' घोषित करना: शिक्षकों को जनगणना और चुनाव ड्यूटी (सिर्फ मतदान दिवस) के अलावा किसी भी गैर-शैक्षणिक कार्य से मुक्त रखा जाए, जैसा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) की मूल भावना भी कहती है।

​डिजिटलीकरण का वास्तविक लाभ: यदि सारा डेटा ऑनलाइन है, तो सत्यापन के लिए शिक्षकों को दर-दर भटकाने के बजाय स्थानीय शिक्षित बेरोजगारों या संविदा कर्मियों को इस कार्य में लगाया जा सकता है।

​निष्कर्ष

​लोकतंत्र का उत्सव (चुनाव) महत्वपूर्ण है, लेकिन इस उत्सव की वेदी पर शिक्षा की बलि देना भविष्य के साथ खिलवाड़ है। यदि हम चाहते हैं कि सरकारी स्कूल निजी स्कूलों से प्रतिस्पर्धा करें, तो शिक्षक को केवल शिक्षक रहने दिया जाए, उसे क्लर्क या डाकिया न बनाया जाए।

​"कलम को जब फाइलों में उलझाया जाता है, तो ब्लैकबोर्ड का रंग फीका पड़ने लगता है।"


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